कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई। अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥ कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाति। तेल घट्या बाती बुझी, (तब) सोवैगा दिन राति ॥ राम रसाइन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल। कबीर पीवण दुलभ है, मागै सीस कलाल।। (UPSC 1987, 20 Marks, )

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