ऊधौ हम आजु भई बड़-भागी। जैसे समन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी ॥ अति आनंद बढ्यो अंग अंग मैं, परै न यह सुख त्यागी। बिसरे सब दुख देखत तुमको स्यामसुन्दर हम लागी ॥ ज्यों दर्पन मधि दृग निरखत जहें हाथ तहां नहि जाई। त्यों ही सूर हम मिली सांवरे बिरह बिथा बिसराई ॥ (UPSC 1991, 20 Marks, )

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