अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी। कैसे रहैं, रूपरस राची ये बतियाँ सुनि रूखी॥ अवधि गनत इकटक मन जोवत तब एती नहिं झूखी। अब इन जोग-सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी॥ बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी। सूर सिकत हटि नाव चलायो ये सरिता हैं सूखी॥
(UPSC 1994, 20 Marks, )