अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ।
(UPSC 2017, 10 Marks, )
Theme:
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ
Where in Syllabus:
(Linguistics)
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ।
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ।
(UPSC 2017, 10 Marks, )
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अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ
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(Linguistics)
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ।
Introduction
अपभ्रंश मध्यकालीन आर्यभाषा की तीसरी अवस्था है, जिसका काल 5वीं से 11वीं सदी तक माना जाता है। यह भाषा भ्रष्ट-भाषा के रूप में विकसित हुई। अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताओं में स्वर लोप, संयुक्त व्यंजन का अंत, और उकारबहुलता प्रमुख हैं। इसमें ऋ का उच्चारण रि हो गया और महाप्राण व्यंजन ह में बदल गए। अपभ्रंश ने हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जैसे कि संज्ञा में छः विभक्तियों का प्रयोग और नए धातुरूपों का विकास।
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ
अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
(i) स्वरों का प्रयोग: अपभ्रंश में हस्व स्वर 'अ', 'इ', 'उ', 'ए', 'ओ' और दीर्घ स्वर 'आ', 'ई', 'ऊ', 'ए', 'ओ' का प्रयोग होता था। 'ऐ' और 'औ' का प्रयोग नहीं मिलता क्योंकि पालि में ही 'ए' और 'ओ' हो गए थे।
(ii) 'ऋ' का उच्चारण: इसमें 'ऋ' का प्रयोग नहीं था, उसका उच्चारण सामान्य 'रि' हो गया।
(iii) स्वर लोप: अपभ्रंश में स्वर लोप की प्रवृत्ति दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, 'रण्ण' (अरण्य), 'लाज' (लज्जा)।
(iv) संयुक्त व्यंजन: संयुक्त व्यंजन समाप्त होने लगे। उदाहरण: 'धर्म' - 'धम्म', 'कर्म' - 'कम्म'।
(v) उकारबहुला भाषा: अपभ्रंश अपनी प्रवृत्ति में उकारबहुला भाषा के रूप में विकसित हुई। उदाहरण: 'मन' - 'मनु', 'अंग' - 'अंगु'।
(vi) अनुनासिक स्वर: कहीं-कहीं स्वरों में अनुनासिक रूप आने लगे। उदाहरण: 'चलहि' - 'चलहिं'।
(vii) महाप्राण व्यंजन: शब्द के मध्य में आने वाले महाप्राण व्यंजन जैसे 'ख', 'घ', 'थ', 'घ' और 'भ' आदि 'ह' में रूपांतरित हो गए। उदाहरण: 'रूधिर' - 'रूहिर', 'दधि' - 'दहि'।
(viii) विभक्तियाँ: अपभ्रंश में एक संज्ञा में केवल छः विभक्तियाँ लगती हैं। प्रमुख परसर्ग हैं: कर्ता – 01, कर्म – 0, हिं, करण – तणं, सऊं, सहूं, संप्रदान – तेहि, केहिं, रसि, अपादान – होत, पास, संबंध – करअ, का, कर, केर, केरी, अधिकरण – महं, मझ।
(ix) सर्वनाम: इस काल में विकसित हुए प्रमुख सर्वनाम 'तुम्हे' है जो वर्तमान हिन्दी में भी प्रयुक्त होता है। इसके अतिरिक्त 'महार', 'तुहार' आदि भी विकसित हुए।
(x) संख्यावाचक विशेषण: इस समय संख्यावाचक विशेषणों का विकास हुआ, जैसे- एक, दु, तिण्ण आदि। कुछ सार्वनामिक विशेषण जैसे- अइस, जइस भी दिखते हैं।
(xi) क्रिया रूप: अपभ्रंश काल में क्रिया में कुछ नए धातुरूप विकसित हुए; जैसे- उठ्ठ, बोल्ल आदि।
(xii) काल: अपभ्रंश में वर्तमान काल संस्कृत की परंपरा की तरह, भूतकाल हिन्दी की तरह कृदंतों के आधार पर तथा भविष्यत काल संस्कृत की परंपरा तथा कृदंतों के आधार पर प्रयोग होते थे।
(xiii) वचन: इस काल में केवल दो वचन प्रचलन में थे।
(xiv) लिंग: अपभ्रंश काल में केवल दो लिंग प्रचलन में था। यद्यपि नपुंसक लिंग नागर अपभ्रंश से अभी भी चलता रहा।
इन विशेषताओं के माध्यम से अपभ्रंश ने हिन्दी के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हिंदी साहित्य के विद्वान जैसे रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी अपभ्रंश के महत्व को स्वीकार किया है। उदाहरण के लिए, हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक "हिंदी साहित्य का इतिहास" में अपभ्रंश के योगदान को विस्तार से समझाया है।
(i) स्वरों का प्रयोग: अपभ्रंश में हस्व स्वर 'अ', 'इ', 'उ', 'ए', 'ओ' और दीर्घ स्वर 'आ', 'ई', 'ऊ', 'ए', 'ओ' का प्रयोग होता था। 'ऐ' और 'औ' का प्रयोग नहीं मिलता क्योंकि पालि में ही 'ए' और 'ओ' हो गए थे।
(ii) 'ऋ' का उच्चारण: इसमें 'ऋ' का प्रयोग नहीं था, उसका उच्चारण सामान्य 'रि' हो गया।
(iii) स्वर लोप: अपभ्रंश में स्वर लोप की प्रवृत्ति दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, 'रण्ण' (अरण्य), 'लाज' (लज्जा)।
(iv) संयुक्त व्यंजन: संयुक्त व्यंजन समाप्त होने लगे। उदाहरण: 'धर्म' - 'धम्म', 'कर्म' - 'कम्म'।
(v) उकारबहुला भाषा: अपभ्रंश अपनी प्रवृत्ति में उकारबहुला भाषा के रूप में विकसित हुई। उदाहरण: 'मन' - 'मनु', 'अंग' - 'अंगु'।
(vi) अनुनासिक स्वर: कहीं-कहीं स्वरों में अनुनासिक रूप आने लगे। उदाहरण: 'चलहि' - 'चलहिं'।
(vii) महाप्राण व्यंजन: शब्द के मध्य में आने वाले महाप्राण व्यंजन जैसे 'ख', 'घ', 'थ', 'घ' और 'भ' आदि 'ह' में रूपांतरित हो गए। उदाहरण: 'रूधिर' - 'रूहिर', 'दधि' - 'दहि'।
(viii) विभक्तियाँ: अपभ्रंश में एक संज्ञा में केवल छः विभक्तियाँ लगती हैं। प्रमुख परसर्ग हैं: कर्ता – 01, कर्म – 0, हिं, करण – तणं, सऊं, सहूं, संप्रदान – तेहि, केहिं, रसि, अपादान – होत, पास, संबंध – करअ, का, कर, केर, केरी, अधिकरण – महं, मझ।
(ix) सर्वनाम: इस काल में विकसित हुए प्रमुख सर्वनाम 'तुम्हे' है जो वर्तमान हिन्दी में भी प्रयुक्त होता है। इसके अतिरिक्त 'महार', 'तुहार' आदि भी विकसित हुए।
(x) संख्यावाचक विशेषण: इस समय संख्यावाचक विशेषणों का विकास हुआ, जैसे- एक, दु, तिण्ण आदि। कुछ सार्वनामिक विशेषण जैसे- अइस, जइस भी दिखते हैं।
(xi) क्रिया रूप: अपभ्रंश काल में क्रिया में कुछ नए धातुरूप विकसित हुए; जैसे- उठ्ठ, बोल्ल आदि।
(xii) काल: अपभ्रंश में वर्तमान काल संस्कृत की परंपरा की तरह, भूतकाल हिन्दी की तरह कृदंतों के आधार पर तथा भविष्यत काल संस्कृत की परंपरा तथा कृदंतों के आधार पर प्रयोग होते थे।
(xiii) वचन: इस काल में केवल दो वचन प्रचलन में थे।
(xiv) लिंग: अपभ्रंश काल में केवल दो लिंग प्रचलन में था। यद्यपि नपुंसक लिंग नागर अपभ्रंश से अभी भी चलता रहा।
इन विशेषताओं के माध्यम से अपभ्रंश ने हिन्दी के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हिंदी साहित्य के विद्वान जैसे रामचंद्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी अपभ्रंश के महत्व को स्वीकार किया है। उदाहरण के लिए, हजारीप्रसाद द्विवेदी ने अपनी पुस्तक "हिंदी साहित्य का इतिहास" में अपभ्रंश के योगदान को विस्तार से समझाया है।
Conclusion
अपभ्रंश मध्यकालीन आर्यभाषा की तीसरी अवस्था है, जिसका काल 5वीं से 11वीं सदी तक माना जाता है। इसकी व्याकरणिक विशेषताओं में स्वर लोप, संयुक्त व्यंजन का अंत, उकारबहुलता, और महाप्राण व्यंजनों का 'ह' में रूपांतरण शामिल हैं। अपभ्रंश ने हिंदी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जैसे कि संज्ञा में छः विभक्तियों का प्रयोग और नए धातुरूपों का विकास। डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार, अपभ्रंश ने हिंदी की नींव रखी। भविष्य में, इसके अध्ययन से हिंदी के विकास को और समझा जा सकता है।