अपभ्रंश और अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना के मुख्य अंतर
(UPSC 2025, 10 Marks, )
अपभ्रंश और अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना के मुख्य अंतर
अपभ्रंश और अवहट्ट की व्याकरणिक संरचना के मुख्य अंतर
(UPSC 2025, 10 Marks, )
Introduction
अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में महत्वपूर्ण अंतर हैं। अपभ्रंश में अरबी, फारसी, और तुर्की शब्दों की संख्या सीमित थी, जबकि प्रारम्भिक हिन्दी में इन भाषाओं से अधिक शब्द आए। प्रारम्भिक हिन्दी में केवल दो लिंग (स्त्रीलिंग और पुलिंग) और दो वचन (एकवचन और बहुवचन) रह गए। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, अपभ्रंश में क्रियारूपों की जटिलता अधिक थी, जबकि हिन्दी में चार लकार प्रमुख रहे। विद्यापति और कबीर जैसे कवियों के कार्यों में पदक्रम की विविधता दिखती है।
Explanation
| व्याकरणिक पक्ष | अपभ्रंश | अवहट्ट |
|---|---|---|
| स्वर और व्यंजन संरचना | हस्व और दीर्घ स्वर (अ, इ, उ, ए, ओ) का प्रयोग; ‘ऋ’ का अभाव; ङ, ञ, न, श, ष का अभाव | दो अतिरिक्त स्वर ‘ए’ और ‘औ’; स्त्रीलिंग शब्द आकारांत (जैसे: शिक्षा → सीख) |
| वचन व्यवस्था | दो वचन – एकवचन और बहुवचन; द्विवचन लुप्त | दो वचन; बहुवचन में ‘न्ह’ या ‘न्हि’ परसर्ग का प्रयोग |
| संज्ञा और कारक व्यवस्था | निर्विभक्तिक/लुप्तविभक्तिक प्रयोग बढ़े; विभक्ति + परसर्ग दोनों का प्रयोग | परसर्गों की संख्या बढ़ी; नए परसर्ग – ‘ने’, ‘मांझ’, ‘महिं’ |
| लिंग संरचना | दो लिंग – पुल्लिंग और स्त्रीलिंग | दो लिंग; स्त्रीलिंग शब्द प्रायः आकारांत |
| क्रिया व्यवस्था | धातु रूपों पर आधारित क्रिया | कृदंत आधारित क्रिया निर्माण; ‘पैढाव’, ‘छ’, ‘रह’ जैसे सहायक/प्रेरणार्थक रूप |
| काल संरचना | वर्तमान, भूत, भविष्य काल के रूप मिलते हैं | तीनों काल विकसित रूप में – जैसे: जात, करत (वर्तमान), चलल (भूत), खाइब (भविष्य) |
| सर्वनाम व्यवस्था | सीमित सर्वनाम प्रयोग | नए सर्वनाम – मैं, हौं, मेरा आदि |
| विशेषण व्यवस्था | सामान्य विशेषण प्रयोग | कृदंतीय विशेषण विकसित; लिंग-वचन के अनुसार परिवर्तन |
Conclusion
अपभ्रंश और प्रारम्भिक हिन्दी के व्याकरणिक स्वरूप में महत्वपूर्ण अंतर हैं। अपभ्रंश में अरबी, फारसी, और तुर्की शब्दों की संख्या सीमित थी, जबकि प्रारम्भिक हिन्दी में इन भाषाओं से अधिक शब्द आए। प्रारम्भिक हिन्दी में केवल दो लिंग (स्त्रीलिंग और पुलिंग) और दो वचन (एकवचन और बहुवचन) रह गए। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, अपभ्रंश में क्रियारूपों की जटिलता अधिक थी, जबकि हिन्दी में चार लकार प्रमुख रहे। विद्यापति और कबीर जैसे कवियों के कार्यों में पदक्रम की विविधता दिखती है।