यह अंधेरा नहीं रहेगा। मानवता के पुजारियों की सम्मिलित वाणी गूंजती है—पवित्र वाणी। उन्हें प्रकाश मिल गया है। तेजोमय! क्षत-विक्षत पृथ्वी के घाव पर शीतल चन्दन लेप रहा है। प्रेम और अहिंसा की साधना सफल हो चुकी है। फिर कैसा भय! विधाता की सृष्टि में मानव ही सबसे बढ़कर शक्तिशाली है। उसको पराजित करना असम्भव है। प्रचण्ड शक्तिशाली बमों से भी नहीं ...... पगला आदमी आदमी है, गिनीपिग नहीं। ..... सबरि ऊपर मानुस सत्य! (UPSC 2005, 20 Marks, )

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