“आचार्य, कुलवधू का आसन, कुलमाता का आसन, कुल महादेवी का आसन दुर्लभ सम्मान है। यह अकिंचन नारी उस आसन के सम्मुख आदर से मस्तक झुकाती है; परन्तु आचार्य, कुलमाता और कुल महादेवी निरादृत वेश्या की भाँति स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं है। ज्ञानी आचार्य, कुलवधू का सम्मान, कुलमाता का आदर और कुल महादेवी का अधिकार कार्य पुरुष का प्रश्रयमात्र है। उसका सम्मान नहीं, उसे भोगने वाले पराक्रमी पुरुष का सम्मान है।” (UPSC 2005, 20 Marks, )

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