लरिकाई को प्रेम, कहौ अलि, कैसे करिकै छूटत? कहा कहौं ब्रजनाथ-चरित अब अंतरगति यों लूटत॥ चंचल चाल मनोहर चितवनि, वह मुसुकानि मंद धुन गावत। नटवर भेस नंदनंदन को वह विनोद गृह वन तें आवत॥ चरनकमल की सपथ करति हौं यह संदेस मोहि विष सम लागत। सूरदास मोहि निमिष न बिसरत मोहन मूरति सोवत जागत॥ (UPSC 1989, 20 Marks, )

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