इस बड़ाई के अनुभव को भोगने का जिसे दुर्व्यसन हो जाता है, उसके लिए उन्नति का द्वार बन्द-सा हो जाता है। उसे हर घड़ी अपनी बड़ाई अनुभव करते रहने का नशा हो जाता है, इससे उसकी चाट के लिए वह सदा अपने से घटकर लोगों की ओर दृष्टि डाला करता है, और अपने से बड़े लोगों की ओर—नशा मिट्टी होने के भय से—देखने का साहस नहीं करता। ऐसी अवस्था में वह उन्नति की उत्तेजना और शिक्षा से वंचित रहता है। (UPSC 1991, 20 Marks, )

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