मानव कब दानव से भी दुर्दांत, पशु से भी बर्बर और पत्थर से भी कठोर करुणा के लिए निरवकाश हृदय वाला हो जाएगा, नहीं जाना जा सकता। अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिन्ता किस बात की? (UPSC 1985, 20 Marks, )

Enroll Now