"भक्ति संबंधहीन सिद्धान्तमार्ग निश्चयात्मिका बुद्धि को चाहे व्यक्त हों, पर प्रवर्तक मन को अव्यक्त रहते हैं। वे मनोरंजनकारी तभी लगते हैं, जब किसी व्यक्ति के, जीवन-क्रम के रूप में देखे जाते हैं। शील की विभूतियाँ अनन्त रूपों में दिखाई पड़ती हैं। जब इन रूपों पर मनुष्य मोहित होता, है, तब सात्विक शील की ओर ओप से आप आकर्षित होता है।"
(UPSC 2011, 20 Marks, )
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"भक्ति संबंधहीन सिद्धान्तमार्ग निश्चयात्मिका बुद्धि को चाहे व्यक्त हों, पर प्रवर्तक मन को अव्यक्त रहते हैं। वे मनोरंजनकारी तभी लगते हैं, जब किसी व्यक्ति के, जीवन-क्रम के रूप में देखे जाते हैं। शील की विभूतियाँ अनन्त रूपों में दिखाई पड़ती हैं। जब इन रूपों पर मनुष्य मोहित होता, है, तब सात्विक शील की ओर ओप से आप आकर्षित होता है।"
(UPSC 2011, 20 Marks, )