अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। 'निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ॥ नयन स्रविं जलु निज हित लागी। जरैँ न पाव देह बिरहागी ॥
(UPSC 2014, 10 Marks, )
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। 'निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ॥ नयन स्रविं जलु निज हित लागी। जरैँ न पाव देह बिरहागी ॥
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥ नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। 'निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥ बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ॥ नयन स्रविं जलु निज हित लागी। जरैँ न पाव देह बिरहागी ॥
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