स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं ? स्पष्ट कीजिए।
(UPSC 2020, 20 Marks, )
Theme:
स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दी की चुनौतियाँ
Where in Syllabus:
(Modern Indian History)
स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं ? स्पष्ट कीजिए।
स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं ? स्पष्ट कीजिए।
(UPSC 2020, 20 Marks, )
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स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दी की चुनौतियाँ
Where in Syllabus:
(Modern Indian History)
स्वातन्त्योत्तर भारत की संवादी भाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग की चुनौतियाँ क्या हैं ? स्पष्ट कीजिए।
Introduction
स्वातन्त्योत्तर भारत में हिन्दी को संवादी भाषा के रूप में अपनाने की प्रक्रिया में कई चुनौतियाँ सामने आईं। महात्मा गांधी ने हिन्दी को जनमानस की भाषा बनाने पर जोर दिया, परंतु क्षेत्रीय भाषाओं की विविधता और अंग्रेजी के प्रभुत्व ने इसे कठिन बना दिया। गणेश देवी के अनुसार, भाषाई पहचान और सांस्कृतिक विविधता के कारण हिन्दी का प्रसार सीमित रहा। 2011 की जनगणना के अनुसार, केवल 44% भारतीय हिन्दी बोलते हैं, जो इसकी स्वीकृति में बाधा है।
स्वातंत्र्योत्तर भारत में हिन्दी की चुनौतियाँ
● अंग्रेजी की मानसिक गुलामी वाली प्रवृत्ति: अंग्रेजी भाषा के प्रति अनावश्यक व्यामोह ने हिंदी को राजभाषा के पद पर पूर्णतः आसीन होने में अवरोध उत्पन्न किया है। उच्चाधिकारी अंग्रेजी में टिप्पणियाँ और पत्राचार करने में ही अपनी विद्वता मानते हैं। उदाहरण के लिए, सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी का अधिक प्रयोग होता है, जिससे हिंदी का प्रयोग सीमित हो जाता है।
● प्रयोगशील भाषा का अभाव: हिंदी का निरंतर प्रयोग न होने के कारण कार्यालयीन पारिभाषिक शब्दावली प्रचलन में नहीं आ पाती। उदाहरण के लिए, कार्यालयीन हिंदी के प्रयोगशील भाषा के स्वरुप का अभाव प्रमुख समस्या है।
● मौलिक सामग्री का अभाव: राजभाषा नीति के क्रियान्वयन में मौलिक सामग्री का अभाव बाधक सिद्ध हुआ है। अनूदित कार्यालयीन साहित्य सहज और ग्राहय नहीं होता, जिससे हिंदी का प्रयोग नहीं हो पाता।
● प्रशासकीय परिभाषिक शब्दावली का अभाव: विविध क्षेत्रों की परिभाषिक शब्दावली का अभाव और उसके निरंतर प्रयोग की अनिच्छा सबसे बड़ी बाधा है। उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक शब्दावली आयोग द्वारा बनाई गई शब्दावलियों का सहज प्रयोग नहीं होता।
● राजभाषा नीति क्रियान्वयन कार्यक्रम की यथोचित समीक्षा का अभाव: सरकार राजभाषा नीति क्रियान्वयन की समीक्षा सिर्फ कागजी आधार पर करती है, जिससे हिंदी का प्रचार-प्रसार सीमित हो जाता है।
● राजभाषा-नीति का दृढ़तापूर्वक परिपालन नहीं: हिंदी दिवस, पखवाड़ा और मास मनाकर हिंदी की निधि हड़प ली जाती है। हिंदी दिवस मनाने के बावजूद हिंदी मात्र राजभाषा के पद पर आसीन हो सकी है।
● हिंदी विषयक कम्प्यूटर वेबसाइट व सॉफ्टवेयर का अभाव: हिंदी कम्प्यूटरीकृत वेबसाइट और सॉफ्टवेयर की सहज उपलब्धता नहीं होने के कारण कर्मचारी अंग्रेजी को अंगीकार करते हैं। उदाहरण के लिए, हिंदी विषयक कम्प्यूटर वेबसाइट व सॉफ्टवेयर की कमी के कारण हिंदी का प्रयोग सीमित हो जाता है।
● प्रयोगशील भाषा का अभाव: हिंदी का निरंतर प्रयोग न होने के कारण कार्यालयीन पारिभाषिक शब्दावली प्रचलन में नहीं आ पाती। उदाहरण के लिए, कार्यालयीन हिंदी के प्रयोगशील भाषा के स्वरुप का अभाव प्रमुख समस्या है।
● मौलिक सामग्री का अभाव: राजभाषा नीति के क्रियान्वयन में मौलिक सामग्री का अभाव बाधक सिद्ध हुआ है। अनूदित कार्यालयीन साहित्य सहज और ग्राहय नहीं होता, जिससे हिंदी का प्रयोग नहीं हो पाता।
● प्रशासकीय परिभाषिक शब्दावली का अभाव: विविध क्षेत्रों की परिभाषिक शब्दावली का अभाव और उसके निरंतर प्रयोग की अनिच्छा सबसे बड़ी बाधा है। उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक शब्दावली आयोग द्वारा बनाई गई शब्दावलियों का सहज प्रयोग नहीं होता।
● राजभाषा नीति क्रियान्वयन कार्यक्रम की यथोचित समीक्षा का अभाव: सरकार राजभाषा नीति क्रियान्वयन की समीक्षा सिर्फ कागजी आधार पर करती है, जिससे हिंदी का प्रचार-प्रसार सीमित हो जाता है।
● राजभाषा-नीति का दृढ़तापूर्वक परिपालन नहीं: हिंदी दिवस, पखवाड़ा और मास मनाकर हिंदी की निधि हड़प ली जाती है। हिंदी दिवस मनाने के बावजूद हिंदी मात्र राजभाषा के पद पर आसीन हो सकी है।
● हिंदी विषयक कम्प्यूटर वेबसाइट व सॉफ्टवेयर का अभाव: हिंदी कम्प्यूटरीकृत वेबसाइट और सॉफ्टवेयर की सहज उपलब्धता नहीं होने के कारण कर्मचारी अंग्रेजी को अंगीकार करते हैं। उदाहरण के लिए, हिंदी विषयक कम्प्यूटर वेबसाइट व सॉफ्टवेयर की कमी के कारण हिंदी का प्रयोग सीमित हो जाता है।
Conclusion
स्वातन्त्योत्तर भारत में हिन्दी के संवादी भाषा के रूप में प्रयोग की चुनौतियाँ विविध हैं। क्षेत्रीय भाषाओं की विविधता, अंग्रेजी का वर्चस्व और भाषाई राजनीति प्रमुख बाधाएँ हैं। महात्मा गांधी ने कहा था, "हिन्दी जनमानस की भाषा होनी चाहिए।" संविधान ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया, परंतु व्यवहार में अंग्रेजी का प्रभुत्व है। समाधान के लिए क्षेत्रीय भाषाओं के साथ समन्वय और हिन्दी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है। नीति आयोग की पहलें इस दिशा में सहायक हो सकती हैं।