खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि, बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी। जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों, ‘कहाँ जाई, का करी?’ बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत, साँकरे सबै पै, राम! रावरें कृपा करी। दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु! दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी॥ (UPSC 1982, 20 Marks, )

Enroll Now