पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उनमान। कहिबे कूं सोभा नहीं, देख्याही परवान॥ अगम अगोचर गमि नहीं, तहां जगमगै जोति। जहाँ कबीरा बंदिगी, तहां पाप पुन्य नहीं छोति॥ हदे छाड़ि बेहदि गया, हुवा निरंतर बास। कवल ज फूल्या फूल बिन, को निरषै निज दास॥ कबीर मन मधुकर भया, रह्या निरंतर बास। कवल ज्यू फूल्या जलह बिन, को देखै निज दास॥ (UPSC 1991, 20 Marks, )

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