पासा पकड़या प्रेम का, सारी किया सरीर। सतगुरु दाव बताइया, खेलै दास कबीर।। अंबर कुंजां कुरलियाँ, 'गरजि भरे सब ताल। जिनषैं गोविंदु बीछुरै, तिनके कौण हवाल।। सुरति समांणी निरति मैं, अजपा माहैं जाप। लेख समाणा अलेख मैं, यूँ आपा माहैं आप।। (UPSC 1996, 20 Marks, )

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