पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव, हाथों से महसूस अनुभव करता हूँ दुनियाँ, मस्तक अनुभव करता है आकाश, दिल में तड़पता है अन्धेरे का अन्दाज, आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगती, केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी। आत्मा में, भीषण सत-चित्-वेदना जल उठी, दहकी। विचार हो गए विचरण-सहचर।
(UPSC 1997, 20 Marks, )
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पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव, हाथों से महसूस अनुभव करता हूँ दुनियाँ, मस्तक अनुभव करता है आकाश, दिल में तड़पता है अन्धेरे का अन्दाज, आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगती, केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी। आत्मा में, भीषण सत-चित्-वेदना जल उठी, दहकी। विचार हो गए विचरण-सहचर।
(UPSC 1997, 20 Marks, )