भूल रहे हो धर्मराज, तुम, अभी हिंस्र भूतल है, खड़ा चतुर्दिक्‌ अहंकार है, खड़ा चतुर्दिक्‌ छल है। में भी हूँ सोचता, जगत से कैसे उठे जिघांसा। किस प्रकार फैले पृथ्वी पर करुणा, प्रेम, अहिंसा। (UPSC 2005, 20 Marks, )

Enroll Now