“ओ विशाल तरु! शत-सहस्र पल्लवन-पतझरों ने जिसका नित रूप सँवारा, कितनी बरसातों, कितने खद्योतों ने आरती उतारी दिन भौरे कर गये गुंजरित, रातों में झिल्ली ने अनथक मंगल-गान सुनाये, सांझ-सवेरे अनगिन अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा-काकलि डाली-डाली को कँपा गयी -। (UPSC 2010, 20 Marks, )

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