“धिक्‌ जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक्‌ साधन जिसके लिये सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार, प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राय का जो न थका जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय बुद्धि के दुर्ग पहुंचा विद्युत-गति हत चेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन। (UPSC 1984, 20 Marks, )

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