“ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति-खेल-सागर अपार, ही श्वसित पवन-उनचास, पिता-पक्ष से तुमुल, एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग उठते पहाड़, जल राशि-राशि "जल पर चढ़ता खाता पछाड़, दर तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा, हो स्फीत-वक्ष, दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।। (UPSC 2009, 20 Marks, )

“ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति-खेल-सागर अपार, ही श्वसित पवन-उनचास, पिता-पक्ष से तुमुल, एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग उठते पहाड़, जल राशि-राशि "जल पर चढ़ता खाता पछाड़, दर तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा, हो स्फीत-वक्ष, दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।।
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“धिक्‌ जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक्‌ साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राम का जो नं थका, जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय, बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युत्‌-गति हतचेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन। (UPSC 2007, 20 Marks, )

“धिक्‌ जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक्‌ साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राम का जो नं थका, जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय, बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युत्‌-गति हतचेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन।
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शत-शुद्धि-बोध - सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है छात्र-धर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से, संयम से रक्षित, वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खण्डित ! देखा, हैं महाशक्ति रावण को लिए अंक, लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक; हत मन्त्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार ! (UPSC 1998, 20 Marks, )

शत-शुद्धि-बोध - सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, जिनमें है छात्र-धर्म का धृत पूर्णाभिषेक, जो हुए प्रजापतियों से, संयम से रक्षित, वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खण्डित ! देखा, हैं महाशक्ति रावण को लिए अंक, लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक; हत मन्त्रपूत शर सम्वृत करतीं बार-बार निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार !
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देखो, बन्धुवर सामने स्थित जो यह भूधर शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर, पार्वती कल्पना हैं इसकी, मकरन्द-बिन्दु; गरजता चरण--प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु; दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर; लख महाभाव-मंगल पदतल धँस रहा गर्व- मानव के मन का असुर मन्द, हो रहा. खर्व। (UPSC 1997, 20 Marks, )

देखो, बन्धुवर सामने स्थित जो यह भूधर शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर, पार्वती कल्पना हैं इसकी, मकरन्द-बिन्दु; गरजता चरण--प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु; दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर; लख महाभाव-मंगल पदतल धँस रहा गर्व- मानव के मन का असुर मन्द, हो रहा. खर्व।
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'ये अश्रु राम के! आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति खेल सागर अपार, हो श्वसित पवन उनंचास, पितापक्ष से तुमुल एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प का उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग भंग उठते पहाड़, जल राशि राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ तोडता बन्ध प्रतिसंध धरा, हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष। (UPSC 1996, 20 Marks, )

'ये अश्रु राम के! आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति खेल सागर अपार, हो श्वसित पवन उनंचास, पितापक्ष से तुमुल एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प का उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग भंग उठते पहाड़, जल राशि राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ तोडता बन्ध प्रतिसंध धरा, हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।
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बोले-“सम्वरो देवि, निज तेज, नहीं वानर यह, - नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर अर्चना राम की मूर्तिमान्‌ अक्षय-शरीर,। चिर-ब्रह्मचर्य-रत, ये एकादश रुद्र धन्य, मर्यादापुरुषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य, लीला-सहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार, करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार विद्या का ले आश्रम इस मन को दो प्रबोध, झुक जाएगा कपि, निश्चय होगा-दूर रोध। (UPSC 1995, 20 Marks, )

बोले-“सम्वरो देवि, निज तेज, नहीं वानर यह, - नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर अर्चना राम की मूर्तिमान्‌ अक्षय-शरीर,। चिर-ब्रह्मचर्य-रत, ये एकादश रुद्र धन्य, मर्यादापुरुषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य, लीला-सहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार, करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार विद्या का ले आश्रम इस मन को दो प्रबोध, झुक जाएगा कपि, निश्चय होगा-दूर रोध।
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बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।। (UPSC 1994, 20 Marks, )

बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।।
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जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।। (UPSC 1991, 20 Marks, )

जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।।
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है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार। (UPSC 1989, 20 Marks, )

है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार।
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बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।। (UPSC 1994, 20 Marks, )

बैठे मारुति देखते रामचरणारविन्द, युग 'अस्ति नास्ति' के एक रूप, गुणगण अनिन्द्य, साधना मध्य भी साम्य वामा कर दक्षिणपद, दक्षिण करतल पर वाम चरण, कपिवर, गद् गद् पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम धाम, जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम नाम। युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल, देखा कवि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल।।
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जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।। (UPSC 1991, 20 Marks, )

जाना बस, पिक-बालिका प्रथम पल अन्य नीड़ में जब सक्षम होती उड़ने को, अपना स्वर भर करती ध्वनित मौन प्रांतर। तू खिंची दृष्टि में मेरी छवि, जागा उर में तेरा प्रिय कवि, उन्मनन-गुंज सज हिला कुंज तरु-पल्लव कलि-दल पुंज-पुंज, बह चली एक अज्ञात बात चूमती केश—मृदु नवल गात, देखती सकल निष्पलक-नयन तू, समझा मैं तेरा जीवन।।
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है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार। (UPSC 1989, 20 Marks, )

है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार, खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार, अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल, भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल। स्थिर राघवेन्द को हिला रहा फिर फिर संशय रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय, जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपुदम्य श्रान्त, एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार।
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“धिक्‌ जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक्‌ साधन जिसके लिये सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार, प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राय का जो न थका जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय बुद्धि के दुर्ग पहुंचा विद्युत-गति हत चेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन। (UPSC 1984, 20 Marks, )

“धिक्‌ जीवन को जो पाता ही आया विरोध, धिक्‌ साधन जिसके लिये सदा ही किया शोध। जानकी ! हाय, उद्धार, प्रिया का हो न सका। वह एक और मन रहा राय का जो न थका जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय बुद्धि के दुर्ग पहुंचा विद्युत-गति हत चेतन राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन।
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शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़, जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़, तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष, शत वायु वेगबल, डूबा अतल में देश भाव, जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।। (UPSC 1979, 20 Marks, )

शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़, जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़, तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष, शत वायु वेगबल, डूबा अतल में देश भाव, जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।।
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