देखता रहा मैं खड़ा अपल, वह शर-क्षेप वह रण-कौशल। व्यक्त हो चुका चीत्कारोत्कल, कुद्ध युद्ध का रुद्ध-कण्ठ फल। और भी फलित होगी वह छवि, जागे जीवन-जीवन का रवि, लेकर कर कल तूलिका कला, देखो क्या रंग भरती विमला, वांछित उस किस लांक्षित छवि पर, फेरती स्नेह की कूची भर! (UPSC 1986, 20 Marks, )

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