स्याम मुख देखे ही परतीति। जो तुम कोटि जतन करि सिखवत जोग ध्यान की रीति।। नाहिंन कछू सयान ज्ञान में यह हम कैसे मानैं। कही कहा कहिए या नभ को कैसे उर में आनैं ॥ यह मन एक, एक वह मूरति भृंगकीट सम माने। सूर सपथ दै बूझत ऊधौ यह ब्रज लोग सयाने ॥
(UPSC 2016, 10 Marks, )
स्याम मुख देखे ही परतीति। जो तुम कोटि जतन करि सिखवत जोग ध्यान की रीति।। नाहिंन कछू सयान ज्ञान में यह हम कैसे मानैं। कही कहा कहिए या नभ को कैसे उर में आनैं ॥ यह मन एक, एक वह मूरति भृंगकीट सम माने। सूर सपथ दै बूझत ऊधौ यह ब्रज लोग सयाने ॥
स्याम मुख देखे ही परतीति। जो तुम कोटि जतन करि सिखवत जोग ध्यान की रीति।। नाहिंन कछू सयान ज्ञान में यह हम कैसे मानैं। कही कहा कहिए या नभ को कैसे उर में आनैं ॥ यह मन एक, एक वह मूरति भृंगकीट सम माने। सूर सपथ दै बूझत ऊधौ यह ब्रज लोग सयाने ॥
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