हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। समुझी बात कहत मधुकर जो? समाचार कछु पायो? इक अति चतुर हुते पहिले ही, अरु करि नेह दिखाए। जानी बुद्धि बड़ी जुबतिन को जोग संदेस पठाए। भले लोग आगे के सखि री! परहित डोलत धाए। वे अपने मन फेरि पाइए जे हैं चलत चुराए।। ते क्यों नीति करत आपनु जे औरनि रीति छुड़ाए? राजधर्म सब भए सूर जहँ प्रजा न जायँ सताए।। (UPSC 2008, 20 Marks, )

हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। समुझी बात कहत मधुकर जो? समाचार कछु पायो? इक अति चतुर हुते पहिले ही, अरु करि नेह दिखाए। जानी बुद्धि बड़ी जुबतिन को जोग संदेस पठाए। भले लोग आगे के सखि री! परहित डोलत धाए। वे अपने मन फेरि पाइए जे हैं चलत चुराए।। ते क्यों नीति करत आपनु जे औरनि रीति छुड़ाए? राजधर्म सब भए सूर जहँ प्रजा न जायँ सताए।।
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ऊधो ! प्रीति न मरन विचारै। प्रीति पतंग जरै पावक परि, जरत अंग नहि टारै।। प्रीति परेवा उड़ता गगन चढि, गिरत न आप सम्हारै। प्रीति मधुप केतकी-कुसुम बसि, कंटक आपु प्रहरै॥ प्रीति जानु जैसे पय पानी, जानि अपनपो जारै। प्रीति कुरंग नाद रस लुब्धक, तानि-तानि सर मारै॥ "प्रीति जान जननी सुत कारन, को न अपनपो हारै। सूर स्याम सो प्रीति गोपिन की, कहु कैसे निरुवारै। (UPSC 1999, 20 Marks, )

ऊधो ! प्रीति न मरन विचारै। प्रीति पतंग जरै पावक परि, जरत अंग नहि टारै।। प्रीति परेवा उड़ता गगन चढि, गिरत न आप सम्हारै। प्रीति मधुप केतकी-कुसुम बसि, कंटक आपु प्रहरै॥ प्रीति जानु जैसे पय पानी, जानि अपनपो जारै। प्रीति कुरंग नाद रस लुब्धक, तानि-तानि सर मारै॥ "प्रीति जान जननी सुत कारन, को न अपनपो हारै। सूर स्याम सो प्रीति गोपिन की, कहु कैसे निरुवारै।
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बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैँ। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजै।। बृथा बहति जमुना, खग बोलत बृथा कमल फुलैं अलि ‘गुंजै। पवन पानि घनसार संजीवनी दधिसुत किरन भानु भई भुँजैं।। ए, ऊधो, कहियो माधव सों विरह कदन करि मारत लुँजैं। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यौँ गुँजैं। (UPSC 1997, 20 Marks, )

बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैँ। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजै।। बृथा बहति जमुना, खग बोलत बृथा कमल फुलैं अलि ‘गुंजै। पवन पानि घनसार संजीवनी दधिसुत किरन भानु भई भुँजैं।। ए, ऊधो, कहियो माधव सों विरह कदन करि मारत लुँजैं। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यौँ गुँजैं।
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बिन गोपाल बैरिनि भई कुंजैं। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलैं, अलि गुंजैं। पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भईं भुंजैं॥ ए, ऊधो कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं। सूरदास प्रभु को मन जोवत अँखियाँ भईं बरन ज्यों गुंजैं॥ (UPSC 1983, 20 Marks, )

बिन गोपाल बैरिनि भई कुंजैं। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलैं, अलि गुंजैं। पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भईं भुंजैं॥ ए, ऊधो कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं। सूरदास प्रभु को मन जोवत अँखियाँ भईं बरन ज्यों गुंजैं॥
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