नटनंदन मोहन सों मधुकर! है काहे की प्रीत? जौ कीजै तो है जल, रवि औ जलधर की सी रीति॥ जैसे मीन, कमल, चातक को ऐसे ही गई बीति। तलफत, जरत, पुकारत सुनु, सठ। नाहिं न है यह रीति॥ (UPSC 2023, 10 Marks, )
नटनंदन मोहन सों मधुकर! है काहे की प्रीत? जौ कीजै तो है जल, रवि औ जलधर की सी रीति॥ जैसे मीन, कमल, चातक को ऐसे ही गई बीति। तलफत, जरत, पुकारत सुनु, सठ। नाहिं न है यह रीति॥View Answer
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कहे को रोकत मारग सूधो? सुनहु मधुप! निर्गुन-कंटक तें राजपंथ क्यों रूँधौ? कै तुम सिखै पठाए कुब्जा, कै कही स्यामघन जू धौं? बेद पुरान सुमृति सब ढूँढ़ौ जुवतिन जोग कहूँ धौ? ताको कहा परेखौ कीजै जानत छाछ न दूधौ। सूर मूर अक्रूर गए लै ब्याज निबेरत ऊधौ॥ (UPSC 2021, 10 Marks, )
कहे को रोकत मारग सूधो? सुनहु मधुप! निर्गुन-कंटक तें राजपंथ क्यों रूँधौ? कै तुम सिखै पठाए कुब्जा, कै कही स्यामघन जू धौं? बेद पुरान सुमृति सब ढूँढ़ौ जुवतिन जोग कहूँ धौ? ताको कहा परेखौ कीजै जानत छाछ न दूधौ। सूर मूर अक्रूर गए लै ब्याज निबेरत ऊधौ॥View Answer
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प्रकृति जोई जाके अंग परी। स्वान-पूँछ कोटिक जो लागै सूधि न काहु करी। जैसे काग भच्छ नहिं छाड़ि जनमत जौन घरी। धोये रंग जात कहु कैसे ज्यों कारी कमरी। ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसी धरनि घरी। सूर होउ सो होउ सोच नहिं, तैसे हैं एउ री ॥ (UPSC 2018, 10 Marks, )
प्रकृति जोई जाके अंग परी। स्वान-पूँछ कोटिक जो लागै सूधि न काहु करी। जैसे काग भच्छ नहिं छाड़ि जनमत जौन घरी। धोये रंग जात कहु कैसे ज्यों कारी कमरी। ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसी धरनि घरी। सूर होउ सो होउ सोच नहिं, तैसे हैं एउ री ॥View Answer
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जीवन मुँहचाही को नीको, दरस परस दिन रात करति है कान्ह पियारे पी को। नयनन मूँदि-मूँदि किन देखौ बँध्यो ज्ञान पोथी को। आछे सुन्दर स्याम मनोहर और जगत सब फीको। “सुनौ जोग को का लै कीजै जहाँ ज्यान ही जी को ?” खाटी मही नही रुचि मानै सूर खवैया घी को॥ (UPSC 2017, 10 Marks, )
जीवन मुँहचाही को नीको, दरस परस दिन रात करति है कान्ह पियारे पी को। नयनन मूँदि-मूँदि किन देखौ बँध्यो ज्ञान पोथी को। आछे सुन्दर स्याम मनोहर और जगत सब फीको। “सुनौ जोग को का लै कीजै जहाँ ज्यान ही जी को ?” खाटी मही नही रुचि मानै सूर खवैया घी को॥View Answer
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स्याम मुख देखे ही परतीति। जो तुम कोटि जतन करि सिखवत जोग ध्यान की रीति।। नाहिंन कछू सयान ज्ञान में यह हम कैसे मानैं। कही कहा कहिए या नभ को कैसे उर में आनैं ॥ यह मन एक, एक वह मूरति भृंगकीट सम माने। सूर सपथ दै बूझत ऊधौ यह ब्रज लोग सयाने ॥ (UPSC 2016, 10 Marks, )
स्याम मुख देखे ही परतीति। जो तुम कोटि जतन करि सिखवत जोग ध्यान की रीति।। नाहिंन कछू सयान ज्ञान में यह हम कैसे मानैं। कही कहा कहिए या नभ को कैसे उर में आनैं ॥ यह मन एक, एक वह मूरति भृंगकीट सम माने। सूर सपथ दै बूझत ऊधौ यह ब्रज लोग सयाने ॥View Answer
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निर्गुन कौन देस को वासी? मधुकर! हंसि समुझाय, सौंह दै बूझति साँच, न हांसी। को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी? कैसो वरन, भेस है कैसो, केहि रस के अभिलासी। पावैगो पुनि कियो आपनो जो रे कहैगो गांसी। सुनत मौन है रही ठग्यौ सो सूर सबे मति नासी॥ (UPSC 2015, 10 Marks, )
निर्गुन कौन देस को वासी? मधुकर! हंसि समुझाय, सौंह दै बूझति साँच, न हांसी। को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी? कैसो वरन, भेस है कैसो, केहि रस के अभिलासी। पावैगो पुनि कियो आपनो जो रे कहैगो गांसी। सुनत मौन है रही ठग्यौ सो सूर सबे मति नासी॥View Answer
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संदेसनि मधुबन-कूप भरे। जो कोउ पथिक गए हैं हयाँ तें फिरि नहिं अवन करे ॥ कै वै स्याम सिखाय समोधे कै वै बीच मरे ? अपने नहिं पठवत नंदनंदन हमरेउ फेरि धरे ॥ मसि खूँटी कागद जल भींजे, सर दव लागि जरे। पाती लिखैं कहो क्यों करि जो पलक-कपाट अरे ? (UPSC 2014, 10 Marks, )
संदेसनि मधुबन-कूप भरे। जो कोउ पथिक गए हैं हयाँ तें फिरि नहिं अवन करे ॥ कै वै स्याम सिखाय समोधे कै वै बीच मरे ? अपने नहिं पठवत नंदनंदन हमरेउ फेरि धरे ॥ मसि खूँटी कागद जल भींजे, सर दव लागि जरे। पाती लिखैं कहो क्यों करि जो पलक-कपाट अरे ?View Answer
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हरि काहे के अंतर्यामी? जी हरि मिलत नहीं यहि औसर, अवधि बतावत लामी।। अपनी चोप जाय उठि बैठे और निरस बेकामी? सो कह पीर पराई जानै जो हरि गरुड़ागामी। आई उघरि प्रीति कलई सी जैसे खाटी आमी।। सूर इते पर अनख मरति हैं, ऊधो, पीवत मामी। (UPSC 2010, 20 Marks, )
हरि काहे के अंतर्यामी? जी हरि मिलत नहीं यहि औसर, अवधि बतावत लामी।। अपनी चोप जाय उठि बैठे और निरस बेकामी? सो कह पीर पराई जानै जो हरि गरुड़ागामी। आई उघरि प्रीति कलई सी जैसे खाटी आमी।। सूर इते पर अनख मरति हैं, ऊधो, पीवत मामी।Enroll Now
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हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। समुझी बात कहत मधुकर जो? समाचार कछु पायो? इक अति चतुर हुते पहिले ही, अरु करि नेह दिखाए। जानी बुद्धि बड़ी जुबतिन को जोग संदेस पठाए। भले लोग आगे के सखि री! परहित डोलत धाए। वे अपने मन फेरि पाइए जे हैं चलत चुराए।। ते क्यों नीति करत आपनु जे औरनि रीति छुड़ाए? राजधर्म सब भए सूर जहँ प्रजा न जायँ सताए।। (UPSC 2008, 20 Marks, )
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। समुझी बात कहत मधुकर जो? समाचार कछु पायो? इक अति चतुर हुते पहिले ही, अरु करि नेह दिखाए। जानी बुद्धि बड़ी जुबतिन को जोग संदेस पठाए। भले लोग आगे के सखि री! परहित डोलत धाए। वे अपने मन फेरि पाइए जे हैं चलत चुराए।। ते क्यों नीति करत आपनु जे औरनि रीति छुड़ाए? राजधर्म सब भए सूर जहँ प्रजा न जायँ सताए।।Enroll Now
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गोपाल बैरनि भइँ कुंजैं। तब ये लतां लगति अति सीतल, अब भइँ विषम ज्वाल की पुजैं।। वृथा बहति जमुना, खग बोलत, वृथा कमल फूलै, अलि गुंजै। पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भर भुंजै। ए, ऊधो, कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यों गुंजैं।। (UPSC 2006, 20 Marks, )
गोपाल बैरनि भइँ कुंजैं। तब ये लतां लगति अति सीतल, अब भइँ विषम ज्वाल की पुजैं।। वृथा बहति जमुना, खग बोलत, वृथा कमल फूलै, अलि गुंजै। पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भर भुंजै। ए, ऊधो, कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यों गुंजैं।।Enroll Now
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जोग ठगौरी व्रज न बिकेहै। यह व्योपार तिहारो ऊधो एसोई फिरि जैहै।। जापै लै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहै। दाख छाँडिके कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै? मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल दैहै? सूरदास प्रभु गुनहिं छाँडिकै को निर्गुन निरबैहै? (UPSC 2005, 20 Marks, )
जोग ठगौरी व्रज न बिकेहै। यह व्योपार तिहारो ऊधो एसोई फिरि जैहै।। जापै लै आए हौ मधुकर ताके उर न समैहै। दाख छाँडिके कटुक निबौरी को अपने मुख खैहै? मूरी के पातन के केना को मुक्ताहल दैहै? सूरदास प्रभु गुनहिं छाँडिकै को निर्गुन निरबैहै?Enroll Now
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निर्गुन कौन देस को बासी? मधुकर! हँसि समुझाय, सौंह दै बूझत साँच, न हाँसी।। को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी? कैसो बरन भेस है कैसो केहि रस में अभिलासी॥ पावैगो पुनि कियो आनो जो रे! कहैगो गाँसी।। सुनत मौन ह्वै रह्यो ठग्यो सो सूर सबै मति नासी॥ (UPSC 2001, 20 Marks, )
निर्गुन कौन देस को बासी? मधुकर! हँसि समुझाय, सौंह दै बूझत साँच, न हाँसी।। को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि, को दासी? कैसो बरन भेस है कैसो केहि रस में अभिलासी॥ पावैगो पुनि कियो आनो जो रे! कहैगो गाँसी।। सुनत मौन ह्वै रह्यो ठग्यो सो सूर सबै मति नासी॥Enroll Now
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ऊधो ! प्रीति न मरन विचारै। प्रीति पतंग जरै पावक परि, जरत अंग नहि टारै।। प्रीति परेवा उड़ता गगन चढि, गिरत न आप सम्हारै। प्रीति मधुप केतकी-कुसुम बसि, कंटक आपु प्रहरै॥ प्रीति जानु जैसे पय पानी, जानि अपनपो जारै। प्रीति कुरंग नाद रस लुब्धक, तानि-तानि सर मारै॥ "प्रीति जान जननी सुत कारन, को न अपनपो हारै। सूर स्याम सो प्रीति गोपिन की, कहु कैसे निरुवारै। (UPSC 1999, 20 Marks, )
ऊधो ! प्रीति न मरन विचारै। प्रीति पतंग जरै पावक परि, जरत अंग नहि टारै।। प्रीति परेवा उड़ता गगन चढि, गिरत न आप सम्हारै। प्रीति मधुप केतकी-कुसुम बसि, कंटक आपु प्रहरै॥ प्रीति जानु जैसे पय पानी, जानि अपनपो जारै। प्रीति कुरंग नाद रस लुब्धक, तानि-तानि सर मारै॥ "प्रीति जान जननी सुत कारन, को न अपनपो हारै। सूर स्याम सो प्रीति गोपिन की, कहु कैसे निरुवारै।Enroll Now
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अँखियाँ हरि दरसन की भूखी। कैसे रहैं रूपरंसराची ये बतियाँ सुनि रूखी।। अवधि गनत इकटक मग जोवत तब एती नहिं झूखी। अब इन जोग सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी।। बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी। ‘सूर’ सिकत हठि नाव चलाओ ये सरिता हैं सूखी।। (UPSC 1998, 20 Marks, )
अँखियाँ हरि दरसन की भूखी। कैसे रहैं रूपरंसराची ये बतियाँ सुनि रूखी।। अवधि गनत इकटक मग जोवत तब एती नहिं झूखी। अब इन जोग सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी।। बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी। ‘सूर’ सिकत हठि नाव चलाओ ये सरिता हैं सूखी।।Enroll Now
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बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैँ। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजै।। बृथा बहति जमुना, खग बोलत बृथा कमल फुलैं अलि ‘गुंजै। पवन पानि घनसार संजीवनी दधिसुत किरन भानु भई भुँजैं।। ए, ऊधो, कहियो माधव सों विरह कदन करि मारत लुँजैं। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यौँ गुँजैं। (UPSC 1997, 20 Marks, )
बिन गोपाल बैरिन भई कुंजैँ। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजै।। बृथा बहति जमुना, खग बोलत बृथा कमल फुलैं अलि ‘गुंजै। पवन पानि घनसार संजीवनी दधिसुत किरन भानु भई भुँजैं।। ए, ऊधो, कहियो माधव सों विरह कदन करि मारत लुँजैं। सूरदास प्रभु को मग जोवत अँखियाँ भई बरन ज्यौँ गुँजैं।Enroll Now
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मोहन माँग्यो अपनो रूप। या ब्रज बसत अँचै तुम बैठीं, ता बिनु तहाँ निरूप। मेरो मन, मेरो अलि ! लोचन लै जो गए धुपधूप। हमसो बदलो लेन उठि धाए मनो धारि कर सूप।। अपनो काज सँवारि सूर, सुनु, हमहि बतावत कूप। लेवा-देइ बराबर में है, कौन रंक को भूप।। (UPSC 1996, 20 Marks, )
मोहन माँग्यो अपनो रूप। या ब्रज बसत अँचै तुम बैठीं, ता बिनु तहाँ निरूप। मेरो मन, मेरो अलि ! लोचन लै जो गए धुपधूप। हमसो बदलो लेन उठि धाए मनो धारि कर सूप।। अपनो काज सँवारि सूर, सुनु, हमहि बतावत कूप। लेवा-देइ बराबर में है, कौन रंक को भूप।।Enroll Now
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ऊधौ विरहौ प्रेम करै। ज्यौ बिनु पुट पट गहत न रँग कौं, रंग न रसै परै।। जौ आंवौं घट दहत अनल तनु तौ पुनि अमिय भरै। जौ धरि बीज देह अंकुर चिरि तौ सत फरनि फरै। जौ सर सहत सुभट संमुख रन तौ रविरथहि सरै। सूर गोपाल प्रेमपथ-जल में कोउ न दुखहि डरै।। (UPSC 1995, 20 Marks, )
ऊधौ विरहौ प्रेम करै। ज्यौ बिनु पुट पट गहत न रँग कौं, रंग न रसै परै।। जौ आंवौं घट दहत अनल तनु तौ पुनि अमिय भरै। जौ धरि बीज देह अंकुर चिरि तौ सत फरनि फरै। जौ सर सहत सुभट संमुख रन तौ रविरथहि सरै। सूर गोपाल प्रेमपथ-जल में कोउ न दुखहि डरै।।Enroll Now
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अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी। कैसे रहैं, रूपरस राची ये बतियाँ सुनि रूखी॥ अवधि गनत इकटक मन जोवत तब एती नहिं झूखी। अब इन जोग-सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी॥ बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी। सूर सिकत हटि नाव चलायो ये सरिता हैं सूखी॥ (UPSC 1994, 20 Marks, )
अँखियाँ हरि-दरसन की भूखी। कैसे रहैं, रूपरस राची ये बतियाँ सुनि रूखी॥ अवधि गनत इकटक मन जोवत तब एती नहिं झूखी। अब इन जोग-सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी॥ बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी। सूर सिकत हटि नाव चलायो ये सरिता हैं सूखी॥Enroll Now
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नँदनंदन मोहन सों मधुकर! है काहे की प्रीति? जौ कीजै तौ है जल, रवि औ जलधर की सी रीति॥ जैसे मीन, कमल, चातक की ऐसे ही गइ बीति। तलफत, जरत, पुकारत सुनु, सठ! नाहिंन है यह रीति॥ मन हठि परे, कबंध-जुद्ध ज्यों, हारेहू भइ जीति। बँधत न प्रेम-समुद्र सूर बल कहुँ बारुहि की भीति॥ (UPSC 1993, 20 Marks, )
नँदनंदन मोहन सों मधुकर! है काहे की प्रीति? जौ कीजै तौ है जल, रवि औ जलधर की सी रीति॥ जैसे मीन, कमल, चातक की ऐसे ही गइ बीति। तलफत, जरत, पुकारत सुनु, सठ! नाहिंन है यह रीति॥ मन हठि परे, कबंध-जुद्ध ज्यों, हारेहू भइ जीति। बँधत न प्रेम-समुद्र सूर बल कहुँ बारुहि की भीति॥Enroll Now
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निरगुन कौन देश कौ बासी। मधुकर, कहि समुझाइ, सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥ को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी। कैसो बरन, भेष है कैसो, केहि रस में अभिलाषी॥ पावैगो पुनि कियो आपुनो जो रे कहैगो गांसी। सुनत मौन ह्वै रह्यौ ठगो-सौ सूर सबै मति नासी॥ (UPSC 1992, 20 Marks, )
निरगुन कौन देश कौ बासी। मधुकर, कहि समुझाइ, सौंह दै बूझति सांच न हांसी॥ को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासी। कैसो बरन, भेष है कैसो, केहि रस में अभिलाषी॥ पावैगो पुनि कियो आपुनो जो रे कहैगो गांसी। सुनत मौन ह्वै रह्यौ ठगो-सौ सूर सबै मति नासी॥Enroll Now
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ऊधौ हम आजु भई बड़-भागी। जैसे समन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी ॥ अति आनंद बढ्यो अंग अंग मैं, परै न यह सुख त्यागी। बिसरे सब दुख देखत तुमको स्यामसुन्दर हम लागी ॥ ज्यों दर्पन मधि दृग निरखत जहें हाथ तहां नहि जाई। त्यों ही सूर हम मिली सांवरे बिरह बिथा बिसराई ॥ (UPSC 1991, 20 Marks, )
ऊधौ हम आजु भई बड़-भागी। जैसे समन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी ॥ अति आनंद बढ्यो अंग अंग मैं, परै न यह सुख त्यागी। बिसरे सब दुख देखत तुमको स्यामसुन्दर हम लागी ॥ ज्यों दर्पन मधि दृग निरखत जहें हाथ तहां नहि जाई। त्यों ही सूर हम मिली सांवरे बिरह बिथा बिसराई ॥Enroll Now
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मधुकर ल्याए जोग सँदेसौ। भली स्याम कुसलात सुनाई, सुनतहिं भयौ अँदेसौ।। आस रही जिय कबहुँ मिलन की, तुम आवत ही नासी। जुवतिनि कहत जटा सिर बाँधौ, तौ मिलिहै अबिनासी।। तुमकौ निज गोकुलहिं पठाए, ते वसुदेव कुमार। ‘सूर’ स्याम मनमोहन बिहरत ब्रज में नंददुलार।। (UPSC 1990, 20 Marks, )
मधुकर ल्याए जोग सँदेसौ। भली स्याम कुसलात सुनाई, सुनतहिं भयौ अँदेसौ।। आस रही जिय कबहुँ मिलन की, तुम आवत ही नासी। जुवतिनि कहत जटा सिर बाँधौ, तौ मिलिहै अबिनासी।। तुमकौ निज गोकुलहिं पठाए, ते वसुदेव कुमार। ‘सूर’ स्याम मनमोहन बिहरत ब्रज में नंददुलार।।Enroll Now
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लरिकाई को प्रेम, कहौ अलि, कैसे करिकै छूटत? कहा कहौं ब्रजनाथ-चरित अब अंतरगति यों लूटत॥ चंचल चाल मनोहर चितवनि, वह मुसुकानि मंद धुन गावत। नटवर भेस नंदनंदन को वह विनोद गृह वन तें आवत॥ चरनकमल की सपथ करति हौं यह संदेस मोहि विष सम लागत। सूरदास मोहि निमिष न बिसरत मोहन मूरति सोवत जागत॥ (UPSC 1989, 20 Marks, )
लरिकाई को प्रेम, कहौ अलि, कैसे करिकै छूटत? कहा कहौं ब्रजनाथ-चरित अब अंतरगति यों लूटत॥ चंचल चाल मनोहर चितवनि, वह मुसुकानि मंद धुन गावत। नटवर भेस नंदनंदन को वह विनोद गृह वन तें आवत॥ चरनकमल की सपथ करति हौं यह संदेस मोहि विष सम लागत। सूरदास मोहि निमिष न बिसरत मोहन मूरति सोवत जागत॥Enroll Now
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संदेसनि मधुवन-कूप भरे। जो कोउ पथिक गए हैं ह्यां'तें फिरि नहि अवन करे ॥ कैव स्याम सिखाय समोधे कैवै बीच मरे ? अपने नहिं पठवत नन्दनन्दन उमरेउ फेरि धरे ॥ मसि खूँटी कागद जल भीजें, सर दव लागि जरे। पाती लिखें कहो क्यों करि जो पलक कपाट अरे ?॥ (UPSC 1988, 20 Marks, )
संदेसनि मधुवन-कूप भरे। जो कोउ पथिक गए हैं ह्यां'तें फिरि नहि अवन करे ॥ कैव स्याम सिखाय समोधे कैवै बीच मरे ? अपने नहिं पठवत नन्दनन्दन उमरेउ फेरि धरे ॥ मसि खूँटी कागद जल भीजें, सर दव लागि जरे। पाती लिखें कहो क्यों करि जो पलक कपाट अरे ?॥Enroll Now
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हमारे हरि हारिल की लकरी। मन बच क्रम नंदनंद सों उर यह दृढ़ करि पकरी॥ जागत, सोबत, सपने सौंतुख कान्ह-कान्ह जक री। सुनतहि जोग लगत ऐसो अति! ज्यों करुई ककरी॥ सोई व्याधि हमें लै आए देखी सुनी न करी। यह तौ सूर तिन्हैं लै दीजै जिनके मन चकरी॥ (UPSC 1987, 20 Marks, )
हमारे हरि हारिल की लकरी। मन बच क्रम नंदनंद सों उर यह दृढ़ करि पकरी॥ जागत, सोबत, सपने सौंतुख कान्ह-कान्ह जक री। सुनतहि जोग लगत ऐसो अति! ज्यों करुई ककरी॥ सोई व्याधि हमें लै आए देखी सुनी न करी। यह तौ सूर तिन्हैं लै दीजै जिनके मन चकरी॥Enroll Now
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तौ हम मानै बात तुम्हारी। अपनौ ब्रह्म दिखावहु ऊधौ, मुकुट पितांबर धारी।। मनिहै तब ताकौ सब गोपी, सहि रहिहैं बरु गारी। भूत समान बतावत हमकौ, डारहु स्याम बिसारी।। जे मुख सदा सुधा अँचवत है, ते विष क्यौ अधिकारी। ‘सूरदास’ प्रभु एक अंग पर, रीझि रही ब्रजनारी॥ (UPSC 1986, 20 Marks, )
तौ हम मानै बात तुम्हारी। अपनौ ब्रह्म दिखावहु ऊधौ, मुकुट पितांबर धारी।। मनिहै तब ताकौ सब गोपी, सहि रहिहैं बरु गारी। भूत समान बतावत हमकौ, डारहु स्याम बिसारी।। जे मुख सदा सुधा अँचवत है, ते विष क्यौ अधिकारी। ‘सूरदास’ प्रभु एक अंग पर, रीझि रही ब्रजनारी॥Enroll Now
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ऊधौ मन नहिं हाथ हमारै। रथ चढ़ाइ हरि संग गए लै, मथुरा जबहिं सिधारे।। नातरु कहा जोग हम छाँड़हि अति रुचि कै तुम ल्याए। हम तौ झँखति स्याम की करनी, मन लै जोग पठाए।। अजहूँ मन अपनौ हम पावै, तुमते होय तो होय। ‘सूर’ सपथ हमैं कोटि तिहारी, कही करैगी सोइ।। (UPSC 1985, 20 Marks, )
ऊधौ मन नहिं हाथ हमारै। रथ चढ़ाइ हरि संग गए लै, मथुरा जबहिं सिधारे।। नातरु कहा जोग हम छाँड़हि अति रुचि कै तुम ल्याए। हम तौ झँखति स्याम की करनी, मन लै जोग पठाए।। अजहूँ मन अपनौ हम पावै, तुमते होय तो होय। ‘सूर’ सपथ हमैं कोटि तिहारी, कही करैगी सोइ।।Enroll Now
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ऊधौ ! ना हम विरहिनि ना तुम दास। कहत सुनत घट प्रान रहत है, हरि तजि भजहु अकास।। विरही मीन मरै जल बिछुरै, छाँड़ि जियन की आस। दास भाव नहिं तजत पपीहा, बरषत मरत पियास।। प्रगट प्रीति दसरथ प्रतिपाली, प्रीतम कै वनवास। ‘सूर’ स्याम सौ दृढ़ व्रत राख्यौ, मेटि जगत उपहास। (UPSC 1984, 20 Marks, )
ऊधौ ! ना हम विरहिनि ना तुम दास। कहत सुनत घट प्रान रहत है, हरि तजि भजहु अकास।। विरही मीन मरै जल बिछुरै, छाँड़ि जियन की आस। दास भाव नहिं तजत पपीहा, बरषत मरत पियास।। प्रगट प्रीति दसरथ प्रतिपाली, प्रीतम कै वनवास। ‘सूर’ स्याम सौ दृढ़ व्रत राख्यौ, मेटि जगत उपहास।Enroll Now
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बिन गोपाल बैरिनि भई कुंजैं। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलैं, अलि गुंजैं। पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भईं भुंजैं॥ ए, ऊधो कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं। सूरदास प्रभु को मन जोवत अँखियाँ भईं बरन ज्यों गुंजैं॥ (UPSC 1983, 20 Marks, )
बिन गोपाल बैरिनि भई कुंजैं। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलैं, अलि गुंजैं। पवन पानि घनसार संजीवनि दधिसुत किरन भानु भईं भुंजैं॥ ए, ऊधो कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजैं। सूरदास प्रभु को मन जोवत अँखियाँ भईं बरन ज्यों गुंजैं॥Enroll Now
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ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी। अपरस रहत सनेहतगा तें, नाहिंन मन अनुरागी॥ पुरइनि-पात रहत जल-भीतर ता रस देह न दाग़ी। ज्यों जल मांह तेल की गागरि बूँद न ताके लागी॥ प्रीति-नदी में पाँव न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी। सूरदास अबला हम भोरी गुर चींटी ज्यों पागी॥ (UPSC 1982, 20 Marks, )
ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी। अपरस रहत सनेहतगा तें, नाहिंन मन अनुरागी॥ पुरइनि-पात रहत जल-भीतर ता रस देह न दाग़ी। ज्यों जल मांह तेल की गागरि बूँद न ताके लागी॥ प्रीति-नदी में पाँव न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी। सूरदास अबला हम भोरी गुर चींटी ज्यों पागी॥Enroll Now
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ऊधौ विरहौ प्रेम करै। ज्यौ बिनु पुट पट गहत न रँग कौं, रंग न रसै परै।। जौ आँवो घट दहत अनल तनु तो पुनि अमिय, भरै। जो धरि बीज देह अंकुर गिरि, तौ सत फरनि फरै।। ज्यौ सर सहत सुभट रन तौ रबि रथहि सरै। ‘सूर’ गुपाल प्रेमपथ चलि करि, क्यौ दुख सुखनि डरै।। (UPSC 1981, 20 Marks, )
ऊधौ विरहौ प्रेम करै। ज्यौ बिनु पुट पट गहत न रँग कौं, रंग न रसै परै।। जौ आँवो घट दहत अनल तनु तो पुनि अमिय, भरै। जो धरि बीज देह अंकुर गिरि, तौ सत फरनि फरै।। ज्यौ सर सहत सुभट रन तौ रबि रथहि सरै। ‘सूर’ गुपाल प्रेमपथ चलि करि, क्यौ दुख सुखनि डरै।।Enroll Now
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प्राति करि दीन्ही गरें छुरी। जैसै बधिक चुगाइ कपट-कन, पाछैं करत बुरी।। मुरली मधुर चेप काँपा करि, मोरचंद ठदवारि। बंक बिलोकनि लूक लागि, बस, सकीं न तनहि।। तलफत छाँड़ि गए मधुबन कौं, फिरि कै लई सार। सूरदास-प्रभु संग कल्पतरु, उलटि न बैठी डार।। (UPSC 1980, 20 Marks, )
प्राति करि दीन्ही गरें छुरी। जैसै बधिक चुगाइ कपट-कन, पाछैं करत बुरी।। मुरली मधुर चेप काँपा करि, मोरचंद ठदवारि। बंक बिलोकनि लूक लागि, बस, सकीं न तनहि।। तलफत छाँड़ि गए मधुबन कौं, फिरि कै लई सार। सूरदास-प्रभु संग कल्पतरु, उलटि न बैठी डार।।Enroll Now
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बिन गोपाल बरनि भई कुंजे।। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजे ॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूले, अलि गुंजे। पवन पानि घनसार संजीवनि दघिसुत किरन भानु भई भुंजे ॥ ए, ऊधो, कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजे। सूरदास प्रभु को मग जोवत अखियाँ भई बरन ज्यों गुंजे ॥ (UPSC 1979, 20 Marks, )
बिन गोपाल बरनि भई कुंजे।। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजे ॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूले, अलि गुंजे। पवन पानि घनसार संजीवनि दघिसुत किरन भानु भई भुंजे ॥ ए, ऊधो, कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजे। सूरदास प्रभु को मग जोवत अखियाँ भई बरन ज्यों गुंजे ॥Enroll Now
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