ऊधो! तुम हौ अति बड़भागी। अपरस रहत सनेहतगा तें, नाहिंन मन अनुरागी॥ पुरइनि-पात रहत जल-भीतर ता रस देह न दाग़ी। ज्यों जल मांह तेल की गागरि बूँद न ताके लागी॥ प्रीति-नदी में पाँव न बोर्यो, दृष्टि न रूप परागी। सूरदास अबला हम भोरी गुर चींटी ज्यों पागी॥ (UPSC 1982, 20 Marks, )

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