कलाकार के लिए कला की अन्तःशक्ति के उद्बोधन के बाद सबसे महत्वपूर्ण विभूति है कला के प्रति एक पवित्र आदरभाव; उसी प्रकार क्रांतिकारी के लिए क्रांति की अन्तःशक्ति के बाद सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है क्रान्तिकारिता के, विद्रोह-भावना के प्रति एक पूजा भाव। इसी के द्वारा उसमें इतनी सामर्थ्य आती है कि वह अपने कार्य में अपने को खोकर, उसमें अपने व्यक्तित्व को सम्पूर्णत: लवलीन करके भी उसकी तटस्थ विवेचना कर सकता है; इसी के द्वारा, वह बहता है तो अपनी इच्छा से बहता है, मरता है तो आत्म-बलिदान की भावना से मरता है, संसार में अपने को सुलाता है तो अपने व्यक्तित्व को पहचानकर। (UPSC 1988, 20 Marks, )

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