उसके मन में भावना हुई, इस दुर्गम पथ पर एक-एक करके सब रसिक रह गये हैं--वृक्ष रह गये, फूल रह गये, बूटियाँ रह गई, एकान्त, तपस्वी नीले पोस्त तक रह् गये-- अब बचे हैं तो नीरस पत्थर, नीरस घास और नीरस जिज्ञासु वह.... इस बीहड़ मार्ग पर सौन्दर्य उसे दीखता ही चाहिए-- पर क्या सौन्दर्य कुछ है भी? क्या रस की कल्पना, आसन्न रस-लब्धि की सद्भाव भावना ही को सौन्दर्य नहीं कह देते? “इससे मैं अभी-अभी सुख पाउँगा” — इस चिन्ता में ही व्यक्ति इतना डूब जाता है कि सुख पाने से पहले ही रस-बोध उसे हो जाता है, तब वह कहता है “कितनी सुन्दर!” वासना की अमूर्त के द्वारा पूर्ति का नाम ही सौन्दर्य है न।
(UPSC 1990, 20 Marks, )
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उसके मन में भावना हुई, इस दुर्गम पथ पर एक-एक करके सब रसिक रह गये हैं--वृक्ष रह गये, फूल रह गये, बूटियाँ रह गई, एकान्त, तपस्वी नीले पोस्त तक रह् गये-- अब बचे हैं तो नीरस पत्थर, नीरस घास और नीरस जिज्ञासु वह.... इस बीहड़ मार्ग पर सौन्दर्य उसे दीखता ही चाहिए-- पर क्या सौन्दर्य कुछ है भी? क्या रस की कल्पना, आसन्न रस-लब्धि की सद्भाव भावना ही को सौन्दर्य नहीं कह देते? “इससे मैं अभी-अभी सुख पाउँगा” — इस चिन्ता में ही व्यक्ति इतना डूब जाता है कि सुख पाने से पहले ही रस-बोध उसे हो जाता है, तब वह कहता है “कितनी सुन्दर!” वासना की अमूर्त के द्वारा पूर्ति का नाम ही सौन्दर्य है न।
(UPSC 1990, 20 Marks, )