कृसगात ललात जो रोटिन को, घरवात घरें, खुरपा-खरिया। तिन्‍ह सोने के मेरु-से ढेर लहे, मनु तौ न भरो, घरु पै भरिया।। “तुलसी” दुख दूनो दसा दुहुँ देखि, कियो मुखु दारिद को करिया। ताजि आस भो दासु रघुप्पतिको, दसरत्थको दानि दया-दरिया। (UPSC 2009, 20 Marks, )

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