मध्यकाल में काव्य-भाषा के रूप में प्रयुक्त ब्रज की विशेषताएँ। (UPSC 2017, 10 Marks, )

Theme: मध्यकालीन काव्य में ब्रज भाषा की विशेषताएँ Where in Syllabus: (Medieval Indian Literature.)
मध्यकाल में काव्य-भाषा के रूप में प्रयुक्त ब्रज की विशेषताएँ।

Introduction

मध्यकाल में ब्रज भाषा काव्य-भाषा के रूप में अत्यधिक लोकप्रिय रही। सूरदास, कबीर, और मीरा जैसे कवियों ने इसे अपनाया। इसकी विशेषता इसकी सरलता और मधुरता है, जो इसे भक्ति काव्य के लिए उपयुक्त बनाती है। रामचंद्र शुक्ल ने इसे "भक्ति आंदोलन की आत्मा" कहा। ब्रज भाषा की लयात्मकता और भावप्रवणता ने इसे जनमानस में गहराई से स्थापित किया।

मध्यकालीन काव्य में ब्रज भाषा की विशेषताएँ

 ● कोमलता और माधुर्य:  
        ○ ब्रजभाषा की मूल शक्ति इसकी अद्भुत कोमलता और माधुर्य में निहित है।
        ○ ध्वनियों जैसे , , , की अधिक आवृत्ति भाषा को मधुर बनाती है।
        ○ उदाहरण: "सोभित कर नवनीत लिए। घुटरूनि चलत रेनु तन मंडित, मुख दधि लेप किये।"
  ● श्रृंगार और वात्सल्य:  
        ○ ब्रजभाषा वात्सल्य और श्रृंगार के क्षेत्र में विशेषीकृत है।
        ○ यह भाषा संयोगश्रृंगार और वियोगश्रृंगार दोनों का सुंदर अंकन करती है।
        ○ उदाहरण: "निरखति अंक श्याम सुंदर के बार-बार लावति छाती।"
  ● गति, प्रवाह और चंचलता:  
        ○ ब्रजभाषा भावों का उतार-चढ़ाव करते हुए अपनी बातों को कम शब्दों में कह देती है।
        ○ इसकी समाहार क्षमता मुक्तक काव्य की सफलता का निर्धारक तत्व है।
        ○ उदाहरण: "कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।"
  ● भाषायी लचीलापन और संगीतात्मकता:  
        ○ ब्रजभाषा में भाषायी लचीलापन और संगीतात्मकता है।
        ○ यह भाषा श्रृंगार और वात्सल्य में विशेषीकृत होने के बावजूद अन्य भावों को भी धारण करने की क्षमता रखती है।
  ● काव्यभाषा के रूप में विकास:  
        ○ भक्तिकाल के उत्तरार्द्ध में ब्रजभाषा का तीव्र विकास हुआ।
        ○ रीतिकाल में यह एकमात्र काव्यभाषा के रूप में स्थापित हो गई।
 ब्रजभाषा की इन विशेषताओं ने इसे मध्यकाल में काव्य-भाषा के रूप में अत्यधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली बना दिया।

Conclusion

मध्यकाल में ब्रज भाषा काव्य-भाषा के रूप में अत्यधिक लोकप्रिय थी। इसकी विशेषताएँ हैं सरलता, मधुरता और लयात्मकता, जो इसे भक्तिकाल के कवियों जैसे सूरदास और कबीर के लिए उपयुक्त बनाती हैं। रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, ब्रज भाषा की सहजता ने इसे जनमानस के करीब ला दिया। आगे बढ़ते हुए, ब्रज भाषा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए शैक्षणिक और सांस्कृतिक प्रयास आवश्यक हैं, जिससे इसकी समृद्ध विरासत को जीवित रखा जा सके।