ऊधौ विरहौ प्रेम करै। ज्यौ बिनु पुट पट गहत न रँग कौं, रंग न रसै परै।। जौ आँवो घट दहत अनल तनु तो पुनि अमिय, भरै। जो धरि बीज देह अंकुर गिरि, तौ सत फरनि फरै।। ज्यौ सर सहत सुभट रन तौ रबि रथहि सरै। ‘सूर’ गुपाल प्रेमपथ चलि करि, क्यौ दुख सुखनि डरै।। (UPSC 1981, 20 Marks, )

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