हरि काहे के अंतर्यामी? जी हरि मिलत नहीं यहि औसर, अवधि बतावत लामी।। अपनी चोप जाय उठि बैठे और निरस बेकामी? सो कह पीर पराई जानै जो हरि गरुड़ागामी। आई उघरि प्रीति कलई सी जैसे खाटी आमी।। सूर इते पर अनख मरति हैं, ऊधो, पीवत मामी। (UPSC 2010, 20 Marks, )

Enroll Now