नँदनंदन मोहन सों मधुकर! है काहे की प्रीति? जौ कीजै तौ है जल, रवि औ जलधर की सी रीति॥ जैसे मीन, कमल, चातक की ऐसे ही गइ बीति। तलफत, जरत, पुकारत सुनु, सठ! नाहिंन है यह रीति॥ मन हठि परे, कबंध-जुद्ध ज्यों, हारेहू भइ जीति। बँधत न प्रेम-समुद्र सूर बल कहुँ बारुहि की भीति॥
(UPSC 1993, 20 Marks, )