बिन गोपाल बरनि भई कुंजे।। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजे ॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूले, अलि गुंजे। पवन पानि घनसार संजीवनि दघिसुत किरन भानु भई भुंजे ॥ ए, ऊधो, कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजे। सूरदास प्रभु को मग जोवत अखियाँ भई बरन ज्यों गुंजे ॥
(UPSC 1979, 20 Marks, )
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बिन गोपाल बरनि भई कुंजे।। तब ये लता लगति अति सीतल, अब भई बिषम ज्वाल की पुंजे ॥ बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूले, अलि गुंजे। पवन पानि घनसार संजीवनि दघिसुत किरन भानु भई भुंजे ॥ ए, ऊधो, कहियो माधव सों बिरह कदन करि मारत लुंजे। सूरदास प्रभु को मग जोवत अखियाँ भई बरन ज्यों गुंजे ॥
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