प्राति करि दीन्ही गरें छुरी। जैसै बधिक चुगाइ कपट-कन, पाछैं करत बुरी।। मुरली मधुर चेप काँपा करि, मोरचंद ठदवारि। बंक बिलोकनि लूक लागि, बस, सकीं न तनहि।। तलफत छाँड़ि गए मधुबन कौं, फिरि कै लई सार। सूरदास-प्रभु संग कल्पतरु, उलटि न बैठी डार।। (UPSC 1980, 20 Marks, )

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