शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़, जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़, तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष, शत वायु वेगबल, डूबा अतल में देश भाव, जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।।
(UPSC 1979, 20 Marks, )
Enroll
Now
शत घूर्णावर्त, तरंग भंग, उठते पहाड़, जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़, तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष, शत वायु वेगबल, डूबा अतल में देश भाव, जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।।
(UPSC 1979, 20 Marks, )