'ये अश्रु राम के! आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति खेल सागर अपार, हो श्वसित पवन उनंचास, पितापक्ष से तुमुल एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प का उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग भंग उठते पहाड़, जल राशि राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़ तोडता बन्ध प्रतिसंध धरा, हो स्फीत वक्ष दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष। (UPSC 1996, 20 Marks, )

Enroll Now