देखो, बन्धुवर सामने स्थित जो यह भूधर शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर, पार्वती कल्पना हैं इसकी, मकरन्द-बिन्दु; गरजता चरण--प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु; दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर; लख महाभाव-मंगल पदतल धँस रहा गर्व- मानव के मन का असुर मन्द, हो रहा. खर्व।
(UPSC 1997, 20 Marks, )
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देखो, बन्धुवर सामने स्थित जो यह भूधर शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर, पार्वती कल्पना हैं इसकी, मकरन्द-बिन्दु; गरजता चरण--प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु; दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर; लख महाभाव-मंगल पदतल धँस रहा गर्व- मानव के मन का असुर मन्द, हो रहा. खर्व।
(UPSC 1997, 20 Marks, )