“ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार, उद्देल हो उठा शक्ति-खेल-सागर अपार, ही श्वसित पवन-उनचास, पिता-पक्ष से तुमुल, एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल, शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग उठते पहाड़, जल राशि-राशि "जल पर चढ़ता खाता पछाड़, दर तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा, हो स्फीत-वक्ष, दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।। (UPSC 2009, 20 Marks, )

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