“श्रेय नहीं कुछ मेरा : मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में - वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सब कुछ को सौंप दिया था - सुना आपने जो वह मेरा नहीं, न वीणा का था : वह तो सब कुछ की तथता थी महाशून्य वह महामौन अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय जो शब्दहीन सबमें गाता है।“
(UPSC 2007, 20 Marks, )