सचमुच, मुझको तो जिंदगी-सरहद सूर्यों के प्रांगण पार भी जाती-सी दीखती! मैं परिणत हूँ कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ — वर्तमान समाज चल नहीं सकता, स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी छल नहीं सकता मुक्ति के मन को, जन को। (UPSC 1996, 20 Marks, )

Enroll Now