सौंदर्य जलधि से भर लाये केवल तुम अपना गरल पात्र, तुम अति अबोध, अपनी अपूर्णता को न स्वयं तुम समझ सके ... 'कुछ मेरा हो' यह राग-भाव संकुचित पूर्णता है अजान — मानस-जलनिधि का क्षुद्र-यान॥ (UPSC 1991, 20 Marks, )

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