उज्ज्वल वरदान चेतना का सौंदर्य जिसे सब कहते हैं: जिसमें अनन्त अभिलाषा के सपने सब जगते रहते हैं। मैं उसी चपल की धात्री हूँ गौरव महिमा हूँ सिखलाती; ठोकर जो लगने वाली है। उसको धीरे से समझाती। (UPSC 1996, 20 Marks, )

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