महा-नृत्य का विषम सम, अरी अखिल स्पंदनों की तू माप, तेरी ही विभूति बनती है सृष्टि सदा होकर अभिशाप। अधंकार के अट्टहास-सी, मुखरित सतत चिरंतन सत्य, छिपी सृष्टि के कण-कण में तू, यह सुन्दर रहस्य है नित्य।। (UPSC 2001, 20 Marks, )

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