आप लोगों की नाराज़गी मुझ पर है तो मुझे ही झेलनी चाहिए और अकेले ही झेलनी चाहिए। दूसरों को इसमें साझीदार बनाना तो दूसरों के साथ अन्याय होगा। कुछ समय पहले आप लोगों ने अपना प्यार और विश्वास दिया था मुझे। मैंने सिर-आँखों पर ही लिया था उसे। आज यदि आप अपनी नाराज़गी देंगे तो उसे भी सिर-आँखों पर ही लूँगा। मेरी गलती पर नाराज़ होना आपका अधिकार है और उसे झेलना मेरा कर्तव्य। (UPSC 2009, 20 Marks, )

आप लोगों की नाराज़गी मुझ पर है तो मुझे ही झेलनी चाहिए और अकेले ही झेलनी चाहिए। दूसरों को इसमें साझीदार बनाना तो दूसरों के साथ अन्याय होगा। कुछ समय पहले आप लोगों ने अपना प्यार और विश्वास दिया था मुझे। मैंने सिर-आँखों पर ही लिया था उसे। आज यदि आप अपनी नाराज़गी देंगे तो उसे भी सिर-आँखों पर ही लूँगा। मेरी गलती पर नाराज़ होना आपका अधिकार है और उसे झेलना मेरा कर्तव्य।
Enroll Now

Introduction
Enroll Now

यह तुम नहीं, तुम्हारा स्वार्थ बोल रहा है। स्वार्थ को इतनी छूट देना ठीक नहीं कि वह विवेक को ही खा जाये। अखबारों को तो आजाद रहना ही चाहिए। वे ही तो हमारे कामों को, हमारी बातों का असली दर्पण होते हैं। मेरा तो उसूल है कि दर्पण को धुँधला मत होने दो। हाँ, अपनी छवि देखने का साहस होना चाहिए आदमी में। (UPSC 2008, 20 Marks, )

यह तुम नहीं, तुम्हारा स्वार्थ बोल रहा है। स्वार्थ को इतनी छूट देना ठीक नहीं कि वह विवेक को ही खा जाये। अखबारों को तो आजाद रहना ही चाहिए। वे ही तो हमारे कामों को, हमारी बातों का असली दर्पण होते हैं। मेरा तो उसूल है कि दर्पण को धुँधला मत होने दो। हाँ, अपनी छवि देखने का साहस होना चाहिए आदमी में।
Enroll Now

Introduction
Enroll Now

आप लोगों की नाराज़गी मुझ पर है तो मुझे ही झेलनी चाहिए और अकेले ही झेलनी चाहिए। दूसरों को इसमें साझीदार बनाना तो दूसरों के साथ अन्याय होगा। कुछ समय पहले आप लोगों ने अपना प्यार और विश्वास दिया था मुझे। मैंने सिर-आँखों पर ही लिया था उसे। आज यदि आप अपनी नाराज़गी देंगे तो उसे भी सिर-आँखों पर ही लूँगा। मेरी गलती पर नाराज़ होना आपका अधिकार है और उसे झेलना मेरा कर्तव्य। (UPSC 2009, 20 Marks, )

आप लोगों की नाराज़गी मुझ पर है तो मुझे ही झेलनी चाहिए और अकेले ही झेलनी चाहिए। दूसरों को इसमें साझीदार बनाना तो दूसरों के साथ अन्याय होगा। कुछ समय पहले आप लोगों ने अपना प्यार और विश्वास दिया था मुझे। मैंने सिर-आँखों पर ही लिया था उसे। आज यदि आप अपनी नाराज़गी देंगे तो उसे भी सिर-आँखों पर ही लूँगा। मेरी गलती पर नाराज़ होना आपका अधिकार है और उसे झेलना मेरा कर्तव्य।
Enroll Now

Introduction
Enroll Now

यह तुम नहीं, तुम्हारा स्वार्थ बोल रहा है। स्वार्थ को इतनी छूट देना ठीक नहीं कि वह विवेक को ही खा जाये। अखबारों को तो आजाद रहना ही चाहिए। वे ही तो हमारे कामों को, हमारी बातों का असली दर्पण होते हैं। मेरा तो उसूल है कि दर्पण को धुँधला मत होने दो। हाँ, अपनी छवि देखने का साहस होना चाहिए आदमी में। (UPSC 2008, 20 Marks, )

यह तुम नहीं, तुम्हारा स्वार्थ बोल रहा है। स्वार्थ को इतनी छूट देना ठीक नहीं कि वह विवेक को ही खा जाये। अखबारों को तो आजाद रहना ही चाहिए। वे ही तो हमारे कामों को, हमारी बातों का असली दर्पण होते हैं। मेरा तो उसूल है कि दर्पण को धुँधला मत होने दो। हाँ, अपनी छवि देखने का साहस होना चाहिए आदमी में।
Enroll Now

Introduction
Enroll Now