“विद्यापति कवि के गान कहाँ?" बहुत दिनों बाद मन में उलझे हुए उस प्रश्न का जवाब दिया — ज़िंदगी-भर बेगारी खटने वाले, अपढ़ गँवार और अर्धनग्नों में, कवि! तुम्हारे विद्यापति के गान हमारी टूटी झोपड़ियों में ज़िंदगी के मधुरस बरसा रहे हैं। — ओ कवि! तुम्हारी कविता ने मचल कर एक दिन कहा था — चलो कवि, बनफूलों की ओर!
(UPSC 2014, 10 Marks, )
“विद्यापति कवि के गान कहाँ?" बहुत दिनों बाद मन में उलझे हुए उस प्रश्न का जवाब दिया — ज़िंदगी-भर बेगारी खटने वाले, अपढ़ गँवार और अर्धनग्नों में, कवि! तुम्हारे विद्यापति के गान हमारी टूटी झोपड़ियों में ज़िंदगी के मधुरस बरसा रहे हैं। — ओ कवि! तुम्हारी कविता ने मचल कर एक दिन कहा था — चलो कवि, बनफूलों की ओर!
“विद्यापति कवि के गान कहाँ?" बहुत दिनों बाद मन में उलझे हुए उस प्रश्न का जवाब दिया — ज़िंदगी-भर बेगारी खटने वाले, अपढ़ गँवार और अर्धनग्नों में, कवि! तुम्हारे विद्यापति के गान हमारी टूटी झोपड़ियों में ज़िंदगी के मधुरस बरसा रहे हैं। — ओ कवि! तुम्हारी कविता ने मचल कर एक दिन कहा था — चलो कवि, बनफूलों की ओर!
(UPSC 2014, 10 Marks, )