बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागे कोइ। राम बियोगी ना जिवै, जिवै त बौरा होइ।। बिरह भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव। साधू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव।। सब रग तंत रबाब तन, बिरह बचावै नित्त। और न कोई सुणि सकै, कै साईं कै चित्त।। (UPSC 1997, 20 Marks, )

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