सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजाये नित्त। और न कोई सुणि सके, के साईं क चित्त॥ समंदरं लागी भ्रागि, नदियाँ जलि कोइला भई। देखि: कबीरा जागि, मंछी रुखा चढ़ि गई॥ मन लागा उन मन्न सौ, गगन पहुंचा जाइ। देख्या चंद बिहुंणां चांदिणां तहां. अलख निरंजनराई॥ गगन गरजि अमृत चवे, कदली कवल प्रकास। तहां कबीरा बंदिगी, कै कोई निज दास॥ (UPSC 1979, 20 Marks, )

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