सिव सकती दिसि कौंण जु जोवै, पछिम दिस उठै धूरि। जल मैं स्यंघ जु घर करै, मछली चढ़ै खजूरि॥ सुरति समाँणो निरति मैं, अजपा माँहै जाप। लेख समाँणाँ अलेख मैं, यूँ आपा माँहै आप॥ सायर नाहीं सीप बिन, स्वाति बूँद भी नाहिं। कबीर मोती नीपजै, सुन्नि सिषर गढ़ माँहिं॥ (UPSC 1995, 20 Marks, )

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