जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस, पुनि रसना नहीं राम। ते नर इस संसार में, उपजि षये बेकाम॥ कबीर प्रेम न चषिया, चषि न लीया साव। सूने घर का पाहुणा, ज्यूं आया त्यूं जाव॥ (UPSC 2009, 20 Marks, )

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