लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु भार॥ कहौ संतो क्यूँ पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार॥ सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त। और न कोई सुणि सके, कै साईं कै चित्त॥ (UPSC 2010, 20 Marks, )

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